शास्त्रों के अनुसार असदगति कई प्रकार से होती है । भूत प्रेत पिशाच आदि योनियों में पड़ा प्राणी अतृप्त होकर अंतरिक्ष तथा पृथ्वी लोक में वायु रूप से भ्रमण करता है वह स्वयं तो कष्ट पाता ही है पर कभी-कभी अन्य प्राणियों को जो अपने कुल अथवा अन्य जातीय वंश परंपरा में उत्पन्न हुए जीव को जिनसे द्वेष प्रीति तथा धन-धान्य आदि संबंध होता है उन्हें भी कष्ट देता है इसी को प्रेत बाधा तथा पितृ बाधा कहा गया है शास्त्रों में असदगति प्राप्त इस प्रकार के प्राणी की सद्गति के लिए एक विशेष प्रकार के श्राद्ध की व्यवस्था है जिसे त्रिपिंडी श्राद्ध कहते हैं इस श्राद्ध में सात्विक राजस तथा तामस प्रेतो के निमित्त विशेष विधि से श्राद्ध किया जाता है इसीलिए यह त्रिपिंडी श्राद्ध कहलाता है विधि पूर्वक इस श्रद्धा के संपन्न होने पर प्राणी भूत प्रेत पिशाच आदि योनियों से मुक्त होकर उत्तम लोक को प्राप्त होते हैं तथा श्राद्धकर्ता को बिना कोई बाधा पहुंचाए सर्वाभिष्ठ प्राप्त करने में सहायक होते हैं अतः ज्ञात अज्ञात रूप से अपने कुल में यदि किसी की मृत्यु हुई है तो उसके उद्धार के निमित्त त्रिपिंडी श्राद्ध प्रायः सबको करा लेना चाहिए जिससे परिवार में कोई पितृ बाधा अथवा प्रेत बाधा आदि हो तो समाप्त हो जाए इस प्रकार यह श्राद्ध सब प्रकार से हितकारी है
शास्त्रों के अनुसार काशी के पिशाच मोचन कुंड में त्रिपिंडी श्राद्ध करने से भटकती आत्माओं को मोक्ष तथा शांति मिल जाती है गरुड़ पुराण में भी पिशाच मोचन कुंड में त्रिपिंडी श्राद्ध करने का उल्लेख है यहां पर किए जाने वाला त्रिपिंडी श्राद्ध से भटकती आत्माओं और पितरों की मुक्ति का मार्ग खुल जाता है वह बैकुंठ धाम पहुंच जाते हैं|
विधि: सर्वप्रथम संकल्प पूर्वक तर्पण किया जाता है तर्पण के उपरांत शालिग्राम अथवा भगवान विष्णु की पूजन किया जाता है विष्णु ब्रह्मा और रुद्र के तीन कलशों की स्थापना होती है तीनों कलश स्थापना के बाद तीन देवों प्रतिमाओं का प्राण प्रतिष्ठा कलश पर किया जाता है विष्णु ब्रह्मा और रुद्र सूक्त का पाठ होता हैं उसके उपरांत सात्विक प्रेत के लिए यव का पिंड ।राजस प्रेत के लिए चावल का पिंड। तामस प्रेत के लिए तिल का पिंड बनता है इस श्राद्ध में यह विशेष बात है पिंड दान होने के बाद शंख से शालग्राम का तर्पण होता है। तीनों पिंडो का तर्पण होता है।ब्राह्मण वस्त्र भोजन दान संकल्प होता है।पिंड का विसर्जन किया जाता है अंत में विष्णु स्मरण पूर्वक प्रार्थना की जाती है
2 या 3 ब्राह्मण के द्वारा | समय : 3 घंटे।
Rs..11,000/-
स्थान-– वाराणसी (काशी) – प्रयागराज – गया
पितृ दोष के लक्षण////घर में क्लेश होना। रोग.. झगड़ा../ विवाह …नौकरी में दिक्कत।नकारात्मक बुरे सपने आना।।/ अचानक कुछ घटना होना।।/ मानसिक दिक्कत// बच्चों का सही राह पर ना चलना आदि दिक्कतें होती है
फायदा//प्रेत बाधा से छुटकारा मिल जाता है प्रेत संबंधित बढ़ाएं दूर हो जाती है मृत प्राणी को मोक्ष मिल जाता है और शांति मिलती है पितरों का आशीर्वाद मिलता है नौकरी विवाह बीमारी परिवार वृद्धि संबंधित सभी परेशानियां समाप्त हो जाती है|
Tripindi Shraddha Pooja Vidhi:
Tripindi Shraddha Pooja is performed with Pind (rice balls) assembled on Vishnu Paad to appease Lord Vishnu in the form of Gadadhar. This is best performed in Teertha Kshetras, as suggested by scriptures. Performing Tripindi at Rameshwaram, Gokarna, Srirangapattana, Gaya, Trimbakeshwar and others Thirtha Kshetras are considered very auspicious. Tripindi Shraddha is recommended in a well-known book “Shraddha Chintamani”. There are many writings like, “Godayatra Vivek Darshan” that can throw light on the cause and effect of Pitru Dosh, as well as Tripindi Shraddha.
Following are the Tripindi Shradha Puja Benefits:
- It gives salvation and peace to the time of descent.
- Will get progress in his professional life.
- All the problems and issues related to professional or career life, marriage, education will get solved.
- Creates stability and Increases prosperity.
- Can save from unnatural and sudden deaths in the family.
- Chances of a good wedding proposal.



